NCERT कक्षा 12 तबला एवं पखावज (संगीत) बुक PDF
यह अनूठी पाठ्यपुस्तक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रमुख अवनद्ध वाद्यों—तबला और पखावज के वादन शिल्प, लयकारी सिद्धांतों और ऐतिहासिक विकास को समेटे हुए है। प्रयोगात्मक बंदिशों के शास्त्रार्थ से लेकर कर्नाटक ताल पद्धति तक, यह पुस्तक संगीत के विद्यार्थियों और विभिन्न अकादमिक परीक्षाओं के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है।
खंड-वार अध्याय सूचकांक एवं PDF डाउनलोड
| अध्याय / क्रम | अध्याय का नाम और डाउनलोड लिंक |
|---|---|
| भाग - क : प्रयोगात्मक (Practical) | |
| अध्याय 1 | ताल की अवधारणा तथा संगीत में इसका महत्व |
| अध्याय 2 | संगीत लिपि पद्धति का संक्षिप्त इतिहास |
| अध्याय 3 | तबला और पखावज के स्वतंत्र वादन में बंदिशों का महत्व |
| भाग - ख : शास्त्र (Theory) | |
| अध्याय 4 | विभिन्न वाद्यों का परिचय |
| अध्याय 5 | तबला एवं पखावज वाद्य की उत्पत्ति तथा विकास |
| अध्याय 6 | कर्नाटक ताल-लिपि पद्धति की अवधारणा |
| अध्याय 7 | जीवन परिचय (महान संगीतज्ञ एवं लयकार) |
संगीत (अवनद्ध वाद्य) पाठ्यक्रम का शैक्षणिक महत्व
कक्षा 12 का यह संगीत पाठ्यक्रम केवल क्रियात्मक कौशलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लयकारी के गणित, उत्तर व दक्षिण भारतीय शैलियों के तुलनात्मक बोध और भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का गहन शास्त्रार्थ प्रस्तुत करता है।
मुख्य सैद्धांतिक एवं क्रियात्मक विमर्श:
- प्रयोगात्मक सौंदर्यबोध (भाग-क): यह खंड संगीत में 'ताल' की मूल आत्मा को स्थापित करता है। विष्णु दिगंबर पलुस्कर और भातखंडे लिपि पद्धतियों के विकास क्रम के साथ-साथ स्वतंत्र वादन (Solo Performance) में कायदा, पेशकार, रेला, तुकड़ा और परन जैसी बंदिशों के सौंदर्यशास्त्र को समझाता है।
- वाद्यों का उद्गम एवं संरचना (भाग-ख): इसके अंतर्गत अवनद्ध, तत, सुषिर और घन वाद्यों का वर्गीकरण किया गया है। पखावज (मृदंग का स्वरूप) और तबला की ऐतिहासिक उत्पत्ति, दिल्ली, लखनऊ, फर्रुखाबाद, बनारस और पंजाब जैसे विभिन्न घरानों (Gharanas) की वादन शैलियों के विकास को विस्तार से रेखांकित किया गया है।
- तुलनात्मक संगीत शास्त्र: अध्याय 6 उत्तर भारतीय (हिंदुस्तानी) और दक्षिण भारतीय (कर्नाटक) संगीत पद्धतियों के बीच एक वैचारिक सेतु का कार्य करता है, जिसमें कर्नाटक संगीत के 35 तालों की मूल संरचना को समझाया गया है।
सत्र 2026-27 के लिए विशेष अध्ययन रणनीति:
- ताल-लिपि (Notation Script) का लिखित अभ्यास: परीक्षाओं में विभिन्न तालों (जैसे—त्रिताल, झपताल, एकताल, चौताल) को दुगुन, तिगुन और चौगुन की लयकारियों में लिपिबद्ध करने के प्रश्न अनिवार्य होते हैं। मात्रा, ताली, खाली और विभाग के सटीक चिह्नों के साथ इनका नियमित अभ्यास करें।
- पारिभाषिक शब्दों की प्रामाणिकता: उत्तर लिखते समय शास्त्रीय तकनीकी शब्दों (जैसे—निकास, मुखड़ा, तिहाई, ग्रही, लय-भंगिमा) का शुद्ध प्रयोग करें। महान लयकारों के जीवन परिचय को पढ़ते समय उनके कालखंड, ऐतिहासिक योगदान और घरानों के अंतर्संबंधों का एक संक्षिप्त चार्ट बना लें।
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